
“वन्दे मातरम्” — यह केवल दो शब्द नहीं हैं। यह भारत की आत्मा का उद्घोष है, सभ्यता की स्मृति है, संघर्ष का साक्षी है और बलिदान की अमर गाथा है।
इन दो शब्दों में भारत की मिट्टी की सुगंध है, माँ की ममता है, स्वतंत्रता की ज्वाला है और राष्ट्र के प्रति सर्वस्व अर्पण करने का संकल्प समाया हुआ है। “वन्दे मातरम्” वह भाव है जिसने भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का स्वप्न ही नहीं दिया, बल्कि उस स्वप्न को साकार करने का साहस भी दिया।
आज जब “वन्दे मातरम्” की रचना के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, तब यह अवसर केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और पुनः संकल्प का है। यह गीत हमारे राष्ट्रीय मनोभाव की पहचान बना और स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
स्वतंत्रता आंदोलन के काल में “वन्दे मातरम्” क्रांतिकारियों के लिए बलिदान का महामंत्र था, तो आज यह राष्ट्रनिर्माण का संकल्प है। कहने को यह केवल दो शब्द हैं, परंतु इन शब्दों में भारत की पूरी चेतना समाहित है। यह न कोई आदेश है, न कोई राजनीतिक नारा —
यह तो मिट्टी की खुशबू है,
माँ की पहचान है।
जब कोई राष्ट्र गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा होता है, तब उसे किसी ऐसी शक्ति की आवश्यकता होती है जो भीतर सोई चेतना को जगा दे। भारत के लिए वह शक्ति “वन्दे मातरम्” थी। यह शब्द नहीं बोलता, यह हृदय बोलता है। इसकी गूँज नसों में बहते रक्त को राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग देती है। इसलिए वन्देमातरम यह राष्ट्र की आत्मा से उपजा गीत है।
“वन्दे मातरम्” के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय केवल एक साहित्यकार नहीं थे, वे राष्ट्रयोगी थे। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब भारत 1857 के असफल संग्राम के बाद गहरी निराशा में डूबा हुआ था, तब बंकिम बाबू के मन में एक प्रश्न उठा— क्या भारत को ऐसा कोई गीत नहीं मिल सकता जो उसे अपनी मातृभूमि से जोड़ दे?
1875 के आसपास बंगाल में ब्रिटिश शासन की कठोरता अपने चरम पर थी। एक संध्या, खेतों से लौटते समय, प्रकृति की गोद में खड़े होकर बंकिम बाबू के हृदय से यह स्वर फूटा—“वन्दे मातरम्…
यही वह क्षण था जब एक गीत ने जन्म लिया, और साथ ही जन्म हुआ एक क्रांति का।
1882 में प्रकाशित उपन्यास आनंदमठ में “वन्दे मातरम्” को स्थान मिला। यह उपन्यास केवल साहित्य नहीं था, यह भारत के नवजागरण का घोष था। सन्यासी योद्धाओं के होठों पर गूंजता “वन्दे मातरम्” अब एक गीत नहीं, बल्कि आंदोलन बन चुका था। यह शब्द सुनने वाला बदल जाता था, इसे गाने वाला निडर हो जाता था। देश के कोने-कोने में यह गीत भारतीय चेतना की धड़कन बन गया।
स्वतंत्रता संग्राम का स्वर
1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे स्वरबद्ध किया और कांग्रेस अधिवेशन में गाया। इसके बाद “वन्दे मातरम्” भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को लांघकर पूरे भारत में गूंज उठा।
तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती, पंजाब में क्रांतिकारी, बंगाल में आंदोलनकारी—सबके लिए यह एक ही स्वर था।
1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह गीत राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना। ब्रिटिश शासन ने इस पर प्रतिबंध लगाया, क्योंकि वे जानते थे— क्रांति तलवार से नहीं, भाव से जन्म लेती है। फांसी के तख्ते पर चढ़ते क्रांतिकारियों के अंतिम शब्द भी यही थे—
“वन्दे मातरम्।”
राष्ट्रीय चेतना का मंत्र
गदर पार्टी से लेकर आज़ाद हिन्द फ़ौज तक,
रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह से लेकर स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई तक— हर जगह “वन्दे मातरम्” गूंजा।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसे राष्ट्र आंदोलन का युद्धगीत कहा।
अरविंदो घोष ने इसे भारत की आत्मा कहा।
गांधीजी के अनुसार यह आत्मा को जागृत करने वाली शक्ति है।
यह गीत बताता है कि माँ केवल भूमि नहीं है—
माँ नदी है, पर्वत है, फसल है, संस्कृति है।
स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने “वन्दे मातरम्” को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया। जन गण मन राष्ट्रगान बना, पर वन्दे मातरम् राष्ट्र की आत्मा रहा।
दोनों भारत के प्राण हैं—
एक स्वर है, दूसरा संवेदना।
आज स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक मुक्ति नहीं है। यह भ्रष्टाचार, स्वार्थ, विभाजन और उदासीनता से मुक्ति का भी नाम है।
आज “वन्दे मातरम्” का अर्थ है—
कर्तव्यनिष्ठा,
उत्कृष्टता,
राष्ट्र के प्रति समर्पण।
जब किसान खेत जोतता है,
सैनिक सीमा पर खड़ा होता है,
शिक्षक संस्कार देता है
और युवा नवाचार करता है—
तब “वन्दे मातरम्” जीवित रहता है।
“वन्दे मातरम्” कोई इतिहास की बंद पुस्तक नहीं है। यह आज भी खेतों की हवा में है, सैनिक के कदमताल में है, माँ की लोरी में है जब-जब यह गाया जाएगा भारत की मिट्टी में नई ऊर्जा जागेगी।
आइए, इस अमर मंत्र को केवल शब्द न बनाएं,
इसे अपने जीवन का संकल्प बनाएं।
वन्दे मातरम्।
वन्दे मातरम्।
वन्दे मातरम्।
(यह लेख श्री चेतस सुखाड़िया ने 7 नवंबर 2025 को वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर लिखा था।)